ये अधूरी तमन्‍नाएं--हाय हाय हाय !!!

Yunus Khan
जिंदगी में कुछ काम हमेशा मुल्‍तवी होते रहते हैं । पता नहीं क्‍यों पिछले कुछ दिनों से वो छूटे अधूरे काम याद आ रहे हैं । शायद इसलिए कि नया साल नई शुरूआत का मौक़ा देता है और हम अपनी जिंदगी को नये सिरे से पटरी पर लाने की कोशिश भी करते हैं । नये साल के वादे यानी new year resolution भी करते हैं । जैसे काकेश जी ने सार्वजनिक-तौर पर किये । और हम सबको प्रेरित भी किया कि मियां क्‍या कर रिए हो । बस समझ लीजिए कि हम इसीलिए जाग गये । और चेहरे पर अफ़सोस का पोस्‍टर चिपका लिया । हाथ में वो फेहरिस्‍त है जिसमें वो इरादे लिखे हैं जिन्‍हें हम पूरा नहीं कर पाए । हाय हाय हाय ।
पढ़ाई के दिनों में हम सोचते थे कि चलो गिटार सीख लिया जाए, पर माता-पिता ने कहा कि भैया पढ़ाई कर लो, गिटार सीखने के लिए तो उम्र पड़ी है । हमारा अपना ही सिक्‍का कमज़ोर था, पढ़ाई के अलावा बाक़ी सब करते थे । जहां कहीं वाद-विवाद प्रतियोगिता होती, पहुंच जाते । जहां कहीं लिखने-पढ़ने का कोई काम होता, प्रतियोगिता होती, वहां भी पहुंच जाते । कुछ ट्रॉफी वग़ैरह जीत लाते । फिर रेडियो पर बोलने की लत भी पढ़ाई के दिनों में ही लग गई थी । सो वहां समय चला जाता । कविताएं लिखना भी जारी था । पर अब अड्डेबाज़ी वाला मामला चल निकला था । मध्‍यप्रदेश के शहर छिंदवाड़ा में एक छोटा सा समूह बनाया था, कथन-समकालीन सोच और सृजन के लिए । इस समूह के ज़रिए चर्चाएं, नुक्‍कड़ नाटक और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता । हंस, पहल, कथ्‍यरूप जैसी पत्रिकाओं में घुसे रहते । घर पर कम सड़कों, चाय की दुकानों, खेल के मैदानों और अपने टुटले टू-व्‍हीलर पर ज्‍यादा पाए जाते । चोरी से फिल्‍में देखते, जिनकी ख़बर किन्‍हीं जादूगरों ( BSNL में कार्यरत पिताजी के मातहत फोन मैकेनिक, लाइनमैन और फोन इंस्‍पेक्‍टर जो जाने कहां कहां से हमें देख लेते थे ) के ज़रिए मेरे घर वालों को चल जाती । तो हम जैसे hopeless child को गिटार सीखने की इजाज़त नहीं मिली । होपलेस इसलिए कि कॉलेज में बंक मारने की वजह से प्रोफेसर्स चिढ़े रहते थे और पढ़ाई में दीदा ना लगने की वजह से घर वाले बोलते थे कि इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता । आज भी मुंबई में धोबी तालाब वाले इलाक़े से गुज़रते हुए Furtados की साज़ों की दुकान में सजे gibson के गिटार देख लेते हैं तो आहें भरते हैं । हाय हाय हाय ।

ऐसी ही एक अधूरी-छूटी तमन्‍ना है देश-भ्रमण की । फिर कॉलेज के दिन याद आ गये । उस ज़माने में हम सोचते थे कि चलो देश घूमा जाए । पर तब पैसे नहीं हुआ करते थे । और अगर हम देश घूमते तो पढ़ाई क्‍या हमारे चाचाजी करते । पता है उस ज़माने में हमने यूथ हॉस्‍टेल एसोसिएशन की सदस्‍यता भी ले ली थी । एकाध कैम्‍प भी किया ट्रैकिंग का । पर वही सब जो गिटार के साथ हुआ वही तफरीह की तमन्‍ना के साथ भी हो गया । विविध भारती में आने के बाद यूथ हॉस्‍टल की मुंबई यूनिट का पता लगाया । मगर फिर मामला टांय टांय फिस्‍स हो गया । यहां हम साफ़ कर दें कि देश भ्रमण वाला हमारा concept ज़रा अलग है । ऐसा नहीं कि साल में महीने पंद्रह दिन के लिए निकले, चार मशहूर पर्यटन स्‍थलों पर गये और लौट आए । इसे हम कहते हैं 'पोस्‍टरी घूमना' । घूमने का हमारा फिनॉमिना ज़रा अलग है, हम चाहते हैं कि एक बार निकलें तो ज़रा चार छह महीनों बाद ही घर लौटें, एक पूरे इलाक़े की ख़ाक छानने के बाद ही दम लें । वो भी अपने कैमेरे और डायरी के साथ । और शिमला या कुल्‍लू मनाली में नहीं बल्कि सुजानगढ़ और मंडी में जाकर रहें । हरिद्वार में नहीं बल्कि अल्‍मोड़ा में रहें । बल्कि और भी कहीं भीतर के गांव में रहने मिल जाए तो क्‍या बात है । वो कहते हैं ना कि 'सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां' । पर हमारा हाल बयां करता है राजेश रेड्डी साहब का ये शेर, जो उन्‍होंने मुंबई के बारे में लिखा है --'इस शहर में आती हैं सैकड़ों पगडंडियां, यहां से बाहर निकलने का कोई रास्‍ता नहीं । कै़द मुंबई शहर की, हाय हाय हाय ।

एक अधूरी पूरी तमन्‍ना है दुनिया भर की फिल्‍में देखने की, जिसे थोड़ा थोड़ा मुंबई आकर पूरा किया जा सका है । जब डी वी डी वाला ज़माना नहीं था तो फिल्‍म समारोहों में पहुंच जाते थे । लाईन लगाकर थियेटर में जाना और फिर लॉटरी की तरह फिल्‍में देखना । खराब निकली तो बाहर आकर बौद्धिक जुगाली । फिर डी वी डी के ज़माने ने फिल्‍म फेस्टिवलों की आवारागर्दी पर थोड़ी सी लगाम लगाई है । नाटक देखने की तमन्‍ना तो जब भी उबाल मारती है तो हम सीधे पृथ्‍वी थियेटर या एन सी पी ए पहुंच जाते हैं । ये अलग बात है कि जब लौट रहे होते हैं तो लगता है कि काश हमारा घर पृथ्‍वी थियेटर के पड़ोस में ही होता, कमबख्‍त पच्‍चीस तीस किलोमीटर आना जाना तो नहीं पड़ता । फिर खूब सारा पढ़ने की तमन्‍ना है, जिसने हमें मुंबईया भाषा में कहें तो 'चश्‍मीश' बना दिया है । चार आंखों वाला । फिर भी पढ़ना उतना नहीं हो रहा है जितने हम पढ़ना चाहते हैं । हां मुंबई आए थे नये नये तो लोकल ट्रेनों की यात्रा में धक्‍का मुक्‍की के बीच कई किताबें पढ़ डालीं । कई कई बार पढ़ीं । ज़रा कुछेक की याद कर ली जाय । हरिया हरक्‍यूलिस की हैरानी और कसम--दोनों मनोहर श्‍याम जोशी की । निर्मल वर्मा की किताब --कव्‍वे और काला पानी । सुरेंद्र वर्मा की 'मुझे चांद चाहिए' । उदय प्रकाश की पाल गोमरा का स्‍कूटर और पीली छतरी वाली लड़की । मंटो की रचनावली । परसाई जी की कई कई किताबें । राही मासूम रज़ा की आत्‍मकथा । कृश्‍न चंदर की आत्‍मकथा--आधे सफर की पूरी कहानी । अनगिनत कविताएं । और जाने क्‍या क्‍या । लंबी फेहरिस्‍त है । धन्‍य हो लोकल ट्रेनों की यात्राएं । पढ़ते तो अब भी हैं पर ज़रा नहीं काफी कम । ये अधूरी तमन्‍नाएं और हाय हाय हाय ।

अब ज़रा एक फेहरस्ति पेश कर दें जल्‍दी जल्‍दी । आपको बता दें कि भोपाल में बचपन के दिनों में हमें लगा था डाकटिकिटों के संग्रह का शौक़ । यानी फिलेटली । आज भी जबलपुर वाले घर में एक ब्रीफकेस के भीतर हमारी बचपन वाली अखबारों की कटिंग और डाकटिकिटों का संग्रह रखा हुआ है । सुरक्षित । एकदम सुरक्षित । हां याद आया । स्‍कूल के दिनों में हमें माचिस की डिब्बियों के रैपर जमा करने का शौक लगा था । सैकड़ों तरह की माचिस की डिब्बियों के कवर रखे थे हमने । रूस्‍टर, चाभी और जाने क्‍या क्‍या । वो एलबम वक्‍त की किसी दरार में जा घुसा है । इसी तरह देश विदेश के सिक्‍के भी जमा किये थे हमने । फिर आया गाने जमा करने का युग । पुराने अनगिनत गानों का संग्रह है । जो लगातार बढ़ रहा है । तमन्‍ना है कि ये ख़ज़ाना और भी ज्‍यादा बढ़े । दुनिया भर के रेडियो स्‍टेशनों को सुनने का शौक़ रहा है हमें । रेडियोनामा पर इस बारे में अलग से लिखा जाएगा । आजकल ये शौक़ भी बंद पड़ा है । देश भर के अखबारों को पढ़ने की तमन्‍ना रहती है, जो धक्‍का लगा लगा कर हम पूरी कर ही लेते हैं । किसी ज़माने में आर्किटेक्‍ट बनने का सपना देखा था, प्री इंजीनियरिंग में सिलेक्‍शन ही नहीं हुआ । इंटीरियर डिज़ायनिंग का शौक़ रहा है । पर ये तमन्‍ना ठंडे बस्‍ते में है । आधी रात को बाईक पर शहर घूमने की तमन्‍ना रहती है । हां मुंबई शहर में हमने अकसर रात को शहर की ख़ाक छानी है । शहर की रात और मैं नाशादो नाकारा फिरूं, ऐ गमे दिल क्‍या करूं । इसका अपना मज़ा है, शहर के कई रूप होते हैं दिन का अलग रात का एकदम अलग । कितनी कितनी तमन्नाएं । उफ़ ये तमन्‍नाएं । ये अधूरी तमन्‍नाएं जिन्‍हें पूरा ना करने का दोष हमारा अपना है । चाहे जितने बहाने बनाएं । इस जुर्म का इक़बाल करते हैं, अपनी तरंग में रहते हैं, कभी ना कभी तो तमन्‍नाओं के बही खाते में हिसाब किताब बराबर हो ही जाएगा । बस जि़द पकड़ लेने की बात है । पर तब तक एक ही उपाय । हम करते रहेंगे हाय हाय हाय ।

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