रोटी का संधर्ष था राम-रावण युध्द


राम रावण युद्ध का प्रमुख कारण सीताहरण तो था ही लेकिन उससे बडा कारण रोटी थी. राम के दंडकारण्य में पंहुचने के बाद राक्षसों की रोटी निरापद नही रह गयी थी.व्यक्ति दुनिया के हर कष्ट बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन अगर कोई उसके पेट पर लात मारे तो बर्दाश्त कर पाना बेहद मुश्किल होता है.सुनने में ये तर्क थोडा अटपटा लग सकता है, लेकिन है सोलह आने सच.अपने बनवास के प्रारंभिक चरण में भगवान राम ने सभी ऋषि मुनि के आश्रम में जाकर उन्हे आश्वस्त किया था कि अब वे आ गये हैं. राक्षसो का समूल विनाश कर देंगे. निसिचर हीन करौं मही, भुज उठाई प्रण कीन्ह, सकल मुन्हिन के आश्रम जाहि-जाहि सुख दीन्ह....राम के बनवास के तेरह साल बीत गये थे लेकिन उनके सामने एक भी राक्षस नही आया, तो उनको चिन्ता हुयी और वो ऋषि अगस्त्य के पास गये. उनसे पूछा कि कि राक्षस तो दिखायी ही नही पडते, मैं उन्है मारूंगा कैसे..मेरे पास कुल जमा एक साल का ही समय शेष है..मुझे क्या करना चाहिये, क्पया मेरा मार्गदर्शन करिये..
ऋषि अगस्त्य मुस्कराये और बोले राम तुम्हे रावण के फार्मूले पर काम करना होगा.. वही करना होगा जो रावण ने तेतीस करोड देवी देवताओं को वशवर्ती बनाने में किया था..क्षुधा की पीर सबसे बडी होती है..योगीजन भी इसे बर्दाश्त नही कर पाते।
‘ क्षुधा पीर सह सके न जोगी। राम बोले, रावण ने क्या किया था और उसके फार्मूले से क्षुधा से क्या रिश्ता था। ऋषि अगस्त्य ने कहा कि देवताओं के बढते प्रभाव से चिंतित रावण ने अपने मंत्री माल्यवान से पूछा था कि ये देवता खाते क्या है जो इतना बलवान रहते है। माल्यवान ने कहा कि देवता खाकर नही, यज्ञ की सुगंधित धूम को सूंधकर धूम को सूंधकर बलिष्ठ रहते हैं..रावण ने देवताओं के बीच राजाज्ञा जारी करवा दी कि पूरी धरती पर यज्ञ, हवन,पूजन और भजन बंद करा दिये जायें।यही नही अगर कोई ये करता मिले तो उसे बहुत कष्ट दिया जाये और उसका सिर धड से अलग कर दिया जाये। ‘ एहि बहुविधि त्रासहिं देस निकासहिं, करहिं जे वेद पुराना। पूरी धरती पर यज्ञ बंद करवा कर रावण ने लंका में यज्ञ करा दिया। भूख से व्याकुल देवता, रावण की लंका में जाते भी तो कैसे। पकडे जाने का भय जो था।
देवताओं की मंत्रणा के अनरूप सर्वप्रथम ब्रम्हाजी रावण के पास पंहुचे और कहा कि रावण , मै तुम्हारा दादा हूं। कई दिनो से भूंखा हूं। मेरे लिये भोजन का प्रबंध करो । रावण ने कहा कि लंका में कुंभकरण को छोडकर बाकी किसी को भी बिना काम के भोजन नही मिलता। कुंभकरण को ये रियायत इसलिये है कि वह साल में दो दिन ही भोजन करता है। बह्मा जी ने कहा कि मैं बूढा होने के नाते कुछ कर भी तो नही सकता। रावण ने कहा कि आप रोज़ प्रातः सुबह उठने से पहले मुझे वेदधव्नि सुनाया करें। और तब से बह्माजी नियमित रूप से रावण को वेदधुव्नि सुनाने लगे। इसके बाद वरूण,कुबेर,अग्नि,वायु आदि देवता एक-एक कर रावण के पास आये और भोजन की शर्त पर उसकी चाकरी स्वीकार कर ली। इस तरह उसने बिना किसी विशेष प्रयास के 33 करोड देवी देवताओं को अपना वशवर्ती कर लिया। भगवान राम ने कहा कि रावण को देवताओं की कमजोरी पता था तो उसने फायदा उठाया, लेकिन मैं रावण के भोजन पर कैसे पाबंदी लगा सकता हूं। ऋषि अगत्स्य जोर से हंसे और बोले कि लंका चारों ओर से पानी से धिरी है। खेती वंहा होती नही। लंका मेधनाद, कुंभकर्ण जैसे बडे-बडे भोजन भट्ट हैं। जो लंका को एक ही बार में खाने की सामर्थ्य रखते है। राक्षसो का सारा भोजन आर्यावर्त से ही जाता है। दंडकारण्य मे वह स्टोर किया जाता है।
खर-दूषण और त्रिशिरा जैसे चौदह सहस्त्र बलवान राक्षस दंडकारण्य स्थित फूड सप्लाई सेंटर की रक्षा करते हैं। रावण ने अपनी बहन सूपर्णखा को उस आपूर्ति केंन्द्र की अधीक्षका बना रखा है। इसलिये आपको अपनी पर्णकुटी दंडकारण्य में ही बनानी चाहिये। ऐसा कहकर उन्होने श्रीराम को दो वाण दिये जिसमें एक वाण वह था जिसे उनके पूर्वज रधु ने रावण पर छोडा था। लेकिन देवताओं के आग्रह पर उन्हे वह बाण लौटाना पडा था। कहना ना होगा कि उसी वाण से रावण की मौत हुयी थी। ऋषि अगस्त्य मार्गदर्शन पाकर राम भगवान श्रीराम दंडकारण्य में जा धमके। उनकी कुटी बने वंहा कुछ ही दिन हुये थे कि शूपर्णखा पूछताछ करने आ गयी। राक्षसों की तमाम आशंकाओं-प्रतिशंकाओ को दरकिनार करते हुये उसने राम-लक्षम्ण से दोस्ती भी गांठनी चाही। लेकिन उसके दैत्य स्वभाव ने उसे धोखा दे दिया।और उसे अपमानित होना पडा।और इसके बाद तो राक्षसो के मरने का सिलसिला ही शुरू हो गया। सीताहरण के बाद हुये युद्ध मे एक लाख पूत सवा लाख नाती वाले रावण के धर में कोई दिया-बाती जलाने वाला नही बचा था। मतलब भूख की जंग में वह रावण जिसके चलने से धरती कांपती थी, अपना सर्वस्व गंवा बैठा। उसने सपने मे भी नही सोचा होगा कि जो प्रयोग उसने देवताओं पर किया था वही प्रयोग उसके लिये धातक सिद्ध होगा।





ये लेख एक समाचार पत्र आज समाज में छपा था, ये पता नही चला कि किसने लिखा है...इसलिये नाम नही है..

टिप्पणियाँ

Madhup ने कहा…
बहुत अच्छी जानकारी है! बहुत अच्छा प्रयास है
अशाेक मधुप

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