बापू को हम ही तो जिंदा रखे है, वरना कौन पूछता है


बापू को हम ही तो जिंदा रखे है, वरना कौन पूछता है। हेडलाईन लगा दी है, लेकिन एडिटोरियल देख लीजिये. और फोटो भी सलेक्ट करना है, मैं जरा कैंटीन से आता हूं, आज ब्रैड पकौडे अच्छे बने है,चाय के साथ मजा आयेगा...आफिस के बाहर अरिहंत जी से बतियाते हुये उनके एक सहयोगी ने कहा, अरिंहत जी मेरे साथ ही खडे थे, सभ्य व्यक्ती है, गांघी को डिफैंड करने लगे..कि नही भाई अभी भी बापू को बहुत लोग पूछते है...अरे छोडिये लोग तो गाली बकते है , कि बुढ्ढे ने देश का बेडा गर्क करवा दिया...नही भाई सिर्फ भाजपाई और संधी ही उनको गरियाते है, वरना आम इंसान बापू का बडा सम्मान करता है, अरिंहत जी ने बचाव किया, लेकिन लगता था कि आज उनके सहयोगी निश्चय करके आये थे कि महात्मा गांधी का चारित्रिक डाइसैक्शन करेगा। मै खडा इस वार्तालाप को सुन रहा था। सवाल उठा कि क्या वाकई 30 जनवरी और 2 अक्टूबर महज औपचारिकता रह गये है। ये प्रिंट वालो की बहस थी। टीवी वालो की भी यही कवायद थी, मीटिंग मे ये निश्चय हुआ कि तीन ओवी लगा देगें । एक राजधाट, दूसरी गांधी संस्थान और तीसरा मुंम्बई के मनी भवन में, जंहा बापू की अस्थींया विर्सजन के लिये रखी गयी है। ये टीवी के हिसाब से बडी कवायद है। लेकिन मन में कई सवाल उठे कि क्या एसे ही इतिहास को याद करता है वर्तमान। क्या बापू सिर्फ नोट पर छापने या फिर फोटो लगाने से चल जायेंगे। गांधीगिरी खूब चली थी, नाटक भी खूब हुये। लेकिन गांधी नही चल रहे। बापू ये 21 वी सदी है,आज कल जैट युग है, आप तो पैदल ज्यादा चला करते थे...

टिप्पणियाँ

बहुत खूब
जरा इधर भी गांधीजी पर गौर फरमाएं

राजीव जैन
http://www.shuruwat.blogspot.com

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