एड में महिलाएं

बात कपड़ा धोने के साबुन की हो या नहाने की इनके प्रचार की जिम्मेदारी शुरुआत से महिलाओं के हिस्से ही आई है। लीला चिटणीस, परवीन बॉबी, सायरा बानो, हेमा मालिनी, जीनत अमान माधुरी दीक्षित और प्रियंका चोपड़ा। ( अंडरवियर यूरो एड) ये एड हमें बताते हैं कि किसी महिला के बारे में सबसे अहम चीज है हमारा नजरिया ( एश्वर्या राय एड –लोरियल ) एड हमें उस दुनिया में ले जाते हैं जहां सुंदरता पूरी तरह बेदाग होती है ( सोनी लैपटॉप एड करिश्मा) ये बताते हैं कि महिलाओं के लिए सुंदरता आंतरिक नहीं बाहरी चीज है इसलिए खूबसूरत होना नहीं खूबसूरत दिखना जरुरी है ( फुटेज) खूबसूरत दिखने के लिए महिलाएं बहुत सारा समय, ऊर्जा और पैसे लगाती हैं और उसके बाद भी उन्हें तसल्ली नहीं मिलती , क्योंकि खूबसूरती का पैमाना इतना ऊंचा है कि उसे हासिल करना नामुमकिन है एड की दुनिया मर्दों और औरतों के लिए अलग अलग पैमाने तय करती है (शाहरुख खान बेलमोन्ट एड) इसलिए मेन्स स्टाइल की एड कुछ इस तरह होती है ( वूमन साड़ी एड) और साड़ी की एड कुछ इस तरह ( ओके मैगजीन , फिल्मफेयर मैगजीन शाहरुख) मैगजीन के कवर पेज पर शाहरुख इस तरह या इस तरह नजर आते हैं ( विद्या बालन , विपासा बसु ) वहीं विद्या बालन इस तरह और विपासा बसु कुछ इस तरह (इंडिया टुडे चिदंबरम, इंडिया टुडे प्रतिभा पाटिल) गृहमंत्री चिदंबरम कवरपेज में पिस्तौल के साथ नजर आ सकते हैं लेकिन महिला राष्ट्रपति ही क्यों न हो उसका दायां हाथ पल्लू पर होना जरुरी है ( सलमान खान स्टारडस्ट , अमृताराव मैक्सिम) मैगजीन के कवर बताते हैं कि मर्द हमेशा एक्टिव होते हैं, ताकतवर होते हैं और महिलाएं कमजोर, छुई मुई और मासूम ( 800 सेलिनी जेटली ) इस एड को देखकर भला कौन यकीं करेगा कि ये एड हाथियों की जिंदगी बचाने के बारे में है एड यानी विज्ञापन का मकसद होता है सामान की बिक्री लेकिन कोई भी एड सिर्फ सामान नहीं बेचता, एड समाज की सोच बताता है, लोगों का नजरिया बताता है। एड हमें ये याद दिलाता है कि हमारे पास क्या नहीं है, और ये भी कि हमें कैसा होना चाहिए। सवाल ये है कि ये एड हमें महिलाओं के बारे में क्या बताते हैं। Fvo ( इंडिया टुडे व्हाट मेन वांट ) टीवी अखबार और पत्रिकाओं के विज्ञापन सिर्फ हमारे नजरिए को नहीं दिखाते, ये हमारी सोच पर भी गहरा असर डालते हैं। दरअसल विज्ञापन की दुनिया में औरत का जिस्म एक ऑबजेक्ट है, एक वस्तु है यानी नुमाइश की चीज है, बाजार में शेल्फ पर रखे किसी दूसरे सामान की तरह मोल लगाने की..और हासिल करने की चीज । ( एमटीआर एड ) यहां तक कि जब ये एड औरत को मां का दर्जा देते हैं, तब भी ये मां सिवाय एक बेहतरीन कुक के कुछ और नहीं ..घर में हर किसी के पसंद का खाना तैयार करना उसका फर्ज है लेकिन साथ बैठकर पति और बच्चों के साथ खाने का हक उसे मयस्सर नहीं। फाइनल वीओ बात डीयो की हो या फेयरनेस क्रीम की.. एड सामान बेचने के मकसद से ही बनाए जाते हैं, लेकिन वो सिर्फ सामान नहीं बेचते, वो समाज को लेकर हमारी सोच और औरतों के बारे में हमारा नजरिया भी बयां करते हैं। Aashish Jha
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