जी-20 शिखर सम्मेलन का मक़सद क्या है?

दुनिया भर में जारी आर्थिक मंदी से निपटने की योजनाओं पर चर्चा करने के लिए प्रमुख देशों के नेता लंदन में जी-20 के शिखर सम्मेलन में लंदन में जमा हुए हैं.
आख़िर ये बैठक क्यों बुलाई गई है और इससे किस तरह के नतीजे निकलने की उम्मीद है.
क्या है जी-20?
दुनिया के सबसे अधिक शक्तिशाली और विकासशील देशों के संगठन का नाम है जी 20.
इन देशों का दुनिया की 85 फ़ीसदी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण है.
इसमें अमरीका और जर्मनी जैसे औद्योगिक देशों के साथ साथ ब्राजील और चीन जैसे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
ब्रिटेन इस समय जी-20 का प्रमुख है. उसने ही दुनिया भर में बढ़ते आर्थिक संकट से निपटने के लिए लंदन में जी-20 के शिखर सम्मेलन का आयोजन किया है.
इसके पहले पिछले साल नवंबर में जी 20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों की वाशिंगटन में बैठक हुई थी.
जी-20 की स्थापना 1999 में एशियाई देशों में आई आर्थिक मंदी पर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा करने के लिए की गई थी.
सम्मेलन का उद्देश्य?
ब्रितानी प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन का मानना है कि लंदन सम्मेलन का उद्देश्य दुनिया भर में जारी आर्थिक संकट से निपटने पर एक नई रणनीति तैयार करना है.
लंदन शिखर सम्मेलन के आयोजन के मुख्य तीन उद्देश्य हैं.
पहला, समन्वित प्रयास से अर्थव्यस्था को पुनर्जीवित करना, ब्याज दरों में और कटौती करना और अधिक खर्च करना जिससे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक मंदी से बाहर निकाला जा सके.
दूसरा, अंतरराष्ट्रीय बैंक व्यवस्था और अन्य वित्तीय संस्थानों को मज़बूत कर भविष्य में आने वाले संकट से बचाने का प्रयास करना.
तीसरा, इसमें भाग ले रहे नेताओं को उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सुधार की कार्ययोजना पर सहमति बन जाएगी.
इससे दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर सुधार का खाका तैयार करना. इसी के तहत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे संगठन में बदलाव शामिल है जिससे ग़रीब देशों की भी आवाज़ सुनी जा सके.
मुख्य रुकावटें क्या हैं?
किसी व्यापक समझौते की उम्मीदें हाल के दिनों में धूमिल हुई हैं.
सबसे विवादास्पद मुद्दा यह रहा है कि विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकारें सार्वजनिक ख़र्च बढ़ाने पर कैसे तैयार होती हैं.
अमरीका की उस अपील का विरोध हो रहा है जिसमें इस वर्ष के साथ-साथ अगले वर्ष भी ख़र्च बढ़ाने का वादा करने की अपील की गई है. विरोध करने वालों में अधिकतर यूरोपीय देश शामिल हैं.
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के पुनर्गठन का मुद्दा भी विवादास्पद हो सकता है.
चीन और ब्राज़ील जैसे उभरते बाजार वाले देशों को अधिक अधिकार देने का मतलब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएसएफ़) और विश्व बैंक में यूरोपीय देशों के प्रभाव को कम करना होगा.
आर्थिक मंदी से सबसे अधिक प्रभावित ग़रीब देशों को कैसे और कितनी आर्थिक सहायता दी जाए इस पर अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है.
इसके लिए अलावा कई देशों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी तरह के संरक्षणवाद के ख़िलाफ़ हैं.
क्या होने की संभावना है?
शिखर सम्मेलन में उम्मीद की जा रही है कि समन्वित प्रयास के लिए एक व्यापक समझौता हो जाएगा लेकिन भविष्य के लिए कोई ठोस खाका तैयार होने की कम संभावना है.
कई देश पहले ही वैश्विक प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा कर चुके हैं. इसलिए सैद्धांतिक रूप से इस तरह के उपायों पर सहमति बनाने में आसानी होगी.
शिखर सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों के पुनर्निमाण की कार्ययोजना बनाने पर सहमति बन सकती है लेकिन इसे अमल में आने में कई साल का समय लगेगा.
इसमें आईएमएफ़ जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठन में परिवर्तन को समर्थन मिल सकता है जिससे उसे और अधिक पैसा मिल सकेगा.
इस बैठक में मुद्रा बाज़ार में होने वाले उतार-चढ़ाव पर रोक लगाने के लिए कोई ठोक क़दम उठाने पर चर्चा होनी है जिसने कई विकासशील देशों को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है. हालांकि इस दिशा में ठोस कदम की कम उम्मीद है.
शिखर सम्मेलन में संरक्षणवाद से बचने की ज़रूरत पर आम सहमति भी बन सकती है. लेकिन पिछले साल रुक गई विश्व व्यापार वार्ता को फिर से शुरू होने की उम्मीद कम है.
जी-20 में शामिल देश हैं- अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ़्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन, अमरीका और यूरोपीय संघ।
साभार बीबीसी

टिप्पणियाँ

संगीता पुरी ने कहा…
अच्‍छी जानकारी उपलब्‍ध करवायी ... इसके लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद।

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