हाथ काटने वाला गांघी

बयान देकर हिट होने का फंडा कोई नया नही है...खासतौर से भारतीय राजनीति और राजनेता अक्सर ही इसके आसरे एक दूसरे से निकलने की कोशिश करते रहते है...इसमें सफलता भी मिलती है...लेकिन इसमें तुरत सफलता है,॥पर वो बात नही जो आपको दिलों में बसा पाये...पीलीभीत में वरूण के न्यायिक हिरासत में जाने के बाद वहा लोगो नें जमकर उपद्रव मचाया। पुलिस को फायरिंग करनी पडी..., लोग जख्मी भी हुये...लेकिन जो लोग पत्थर फैंक रहे थे, वो या तो वेराजगार रहे होंगे, या फिर बेहतरी की उम्मीद में इस नेता के चमचो के साथ आ गये होंगे...बदलता कुछ भी नही है...उम्मीद बांधने वाले नेता जरूर बदल जाते है...कौन नही जानता कि हिंदुओं की तरफ बढने वाले हाथ और उन्है काटने की बातें, जुमलों में अच्छी लगती है...सौभाग्य से अपना देश न तालिबान का अड्डा बन सका है और ना ही स्वात घाटी...
पूछने पर ये बताना मुश्किल हो जायेगा कि गांधी-नेहरू परिवार के इस जूनियर नें जनता के लिये कुल जमा किया क्या है...लेकिन उस एक अदद बयान का कमाल देखिये कि वरूण रातों रात स्टार बन गये है...
लेकिन ....आज वरूण है, कल कोई और होगा...कल कोई और था...
इस देश में वरूण जैसे कई और नेता रहे हैं...ठाकरे परिवार को कौन भूल सकता है...जिनकी कमाई का बडा हिस्सा मानो बयान ही रहे हैं...कभी इस बात पर ...कभी उस बात पर ...वो ये मानते है कि इसे या उसे खत्म कर देने में महाराष्ट के दुखो की मुक्ति है...ना कि कुछ रचनात्मक करने में...
कुछ खडा करने के बजाय, बहुत कुछ नाश करने का ये फार्मूला ही उल्टे सीघे बयान दिलवाता है...रातों रात हिट बनाता है...इसी तर्ज पर प्रवीण तोगडिया रातो रात खासी चर्चा हासिल कर गये, जो हिंदु स्वभाविमान की बात तो करते है लेकिन ये नही बता पाते कि खाली पेट ये स्वभाविमान आयेगा कंहा से...और ये भी नही कि सीना तानकर चलने से किस बात की और जरूरत है कि घर का चूल्हा जलता रहे...
एक बयान का ये फंडा कभी वरूण गांघी को हिट कराता है, तो कभी प्रमोद मुतालिक...कौन जानता था कि कोई जनाब मुतालिक है...लेकिन युवाओ को पीटकर मुतालिक ने अपना चेहरा पहचान वाला तो बना ही लिया है...
ये बात वरूण भी जानते होंगे , मुतालिक भी और ठाकरे भी, कि पहचान बनाना एक बात है, दिलों में उतरना दूसरी...
एक गांधी थे जिन्होने हक की लडाई के लिये लंबी लडाई लडी थी,वो उपवास करते थे, मौन रखते थे...उनके मौन में हजारों शब्दो से ज्यादा की ताकत होती थी....लेकिन ये गांघी चीखता चिल्लाता भी है,,फिर भी वो इस बात से डरता है कि पता नही कि उसकी बात में इतना दम है कि नही कि वो आने वाली १६ मई के चुनाव में जनता उसे चुनती नही है...
तभी तो जो वो गांघी थे, वो बापू कहलाये, लेकिन इस लोग हाथ काटने वाला गांघी....

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
गांघी कौन है? गाँधी का चचा?
हरि ने कहा…
हो सकता है कि तात्‍कालिक रूप से वरुण को कुछ फायदा मिल जाए। लेकिन ये दीर्घकालिक नहीं है।
रौशन ने कहा…
नेता बनने के शार्टकट्स ऐसे ही हैं
बेनामी ने कहा…
....तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे छू न पाये सीता का दामन कोई ।
... यार वरूण ने अपनी ओर हमले मे उठने वाले हाथ काटने की बात कही है न कि मुस्लिमो या ईसाइयों के हाथ... । नही कांग्रेस या बसपा के हाथ । ठीक है कि उसने चुनावी फण्डा के तहत कुछ ज्यादा जोश खरोश दिखा दिया आखिर है तो बच्चा ही । यहां तो बड़े-बड़े सुरमा भी तिलक तराजू जैस से लेकर यलगार तक की बात करते हैं ।
..... मैंने पांच वर्ष पहले वरूण के भाषण को सुना था, तभी मुझे यह अहसास हुआ की वह राहुल व प्रियंका से उम्र व अनुभव के हिसाब से भले पीछे हो किंतु देश, जनता व राष्ट्रीयता के हिसाब से कहीं आगे है । बंधु याद रखो आने वाले समय में वरूण जैसे युवाओं को राजनीति के सबसे उचें क्रम (एम.पी.-टू-पी.एम.) तक भी पहुंचना है । तो टिप्पणी और भी तल्ख करों किंतु बैलेंस बना कर ।
.......... हिंदुस्थान में हिंदु बहुल्य वाले कोई भी सरकार से हज यात्रा, चर्च के लिए जमीन, ईसाई स्कूल मे बाईबिल की पढ़ाई, म मुस्लिम स्कूल मे कुरान की पढ़ाई यह सब चलने दो कोई बात नही । किंतु राष्ट्र विरोधी तत्वों के साथ हाथ मिला कर बहुसंख्यक हिंदु समाज या अन्य समाज पर हमला कर आपस में लड़ाने वालों का तो हाथ ही काटा जाना चाहिये । यहां अब भी नमस्ते या सलाम करने वाले अथवा मदद पहुंचाने वाले हाथों की बात नही कही जा रही है । केवल दंगा फैलाने वाले राष्ट्र विरोधी तत्वों के हाथ काटने की बात कही जा रही है । .... आर. शर्मा
रायपुर (छ.ग.)

लोकप्रिय पोस्ट