भाजपा और संघ का रिश्ता

मोहन भागवत के नये सर संघ चालक का पद संभालने के बाद ये जानना जरूरी है कि संघ के इतिहास में पहली दफा हुयी इस घटना के मायने क्या है...और भाजपा और संघ का दरअसल रिश्ता क्या है...
बीबीसी के राजेश जोशी का ये लेख मुफीद है...

हर सुबह देश भर में लगने वाली लगभग पचास हज़ार शाखाओं में ख़ाकी निकर, सफ़ेद क़मीज़ पहने और हाथ में डंडा लिए क़वायद करने वाले स्वयंसेवक हिंदुत्व की विचारधारा के प्राणवाहक हैं.
मुद्दा चाहे राम जन्मभूमि का हो या धर्मपरिवर्तन का, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व इन कार्यकर्ताओं के ज़रिए ही अलग अलग तरीक़ों से देश भर में अपना संदेश फैलाता है.
अब भारतीय जनता पार्टी भी एक बार फिर से इन्हीं कार्यकर्ताओं के भरोसे चुनाव के अखाड़े में कूदी है.
लेकिन जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को संघ के कार्यकर्ताओं की ज़रूरत है, क्या भाजपा का सत्ता में बने रहना संघ के लिए भी उतना ही ज़रूरी नहीं है?
भाजपा के सत्ता हासिल करने से संघ को क्या फ़ायदा हुआ?
विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर कहते हैं, ''निश्चित रूप से इससे एक फ़ायदा तो हुआ है कि हिंदुत्व का प्रभाव हर जगह बढ़ा है. इस सरकार की छवि हिंदुत्व की है और इस बात को लोग मानने लगे हैं.''
आरएसएस के सदस्य रह चुके और अब उसके प्रखर आलोचक डीआरगोयल भी मानते हैं कि भाजपा के सत्ता में रहना संघ के लिए फ़ायदेमंद रहा.
विरोध और उसका समय
लेकिन गुज़रे पाँच सालों पर नज़र डालें तो संघ और भाजपा के बीच कड़वाहट के कई उदाहरण मिल जाएँगे.

विश्व हिंदू परिषद का मानना है कि मंदिर मुद्दे पर भाजपा ने अपना वादा पूरा नहीं किया
संघ के वरिष्ठ नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी ने वाजपेयी की तुलना घटिया राजनीतिज्ञ से कर दी और दिल्ली के रामलीला मैदान में भारतीय मज़दूर संघ की एक रैली में उन्होंने तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को खुलेआम अपराधी तक कहा.
पांचजन्य के संपादक तरुण विजय इसका बचाव करते हुए कहते हैं, '' जब कई तरह की आवाज़ें उठती हैं तो ये इस बात का संकेत हैं कि समाज बहुत जीवंत है.''
लेकिन विरोध के सुर लगातार धीमे होते गए और चुनाव आते-आते लगभग ख़ामोश हो गए.
विश्व हिंदू परिषद ने भी रामजन्म भूमि के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी सरकार पर वार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. आचार्य गिरिराज किशोर मानते हैं कि राममंदिर के मुद्दे पर सरकार उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी. वे कहते हैं,''उस मामले में हमारा विरोध था और अब भी है.''
लेकिन विरोध अगर है तो कम से कम चुनावों के इस माहौल में कहीं उसकी कोई गूँज सुनाई नहीं पड़ती.
वाजपेयी के बदलते सुर
वाजपेयी को बहुत से लोग उदारवादी मानते हैंलेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चे के गठन के साथ ही वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने जब हिंदुत्व के मुद्दों को हाशिए पर डालने की बात कही तो संघ परिवार के संगठनों के लिए अपनी साख बचाना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया और वाजपेयी की आलोचना बढ़ गई.
और तभी एक दिन अचानक वाजपेयी ने टेलीविज़न कैमरों के सामने ये बयान देकर सबको चौंका दिया कि रामजन्मभूमि आंदोलन राष्ट्रवाद का प्रकटीकरण था.
सितंबर 2000 में अपनी अमरीका यात्रा के दौरान विश्व हिंदू परिषद के साधुओं की एक सभा में वाजपेयी ने घोषणा की कि स्वयंसेवक होने का उनका अधिकार कोई नहीं छीन सकता.
क्या वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अपनी सहयोगी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और हिंदूवादी संगठनों के बीच संतुलन बना रहे थे या फिर आरएसएस के राजनीतिक एजेंडे पर काम करने का उनका ये अपना तरीक़ा था?
पिछले हफ़्ते राजस्थान के जयपुर शहर में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा में मुसलमानों के प्रति संघ के रवैए में बदलाव की ध्वनियाँ थीं.
मुसलमान प्रभावित हों या नहीं लेकिन उन्हें संघ परिवार में आमंत्रित करने के विचार से ही क्या ये ज़ाहिर नही होता कि ये अटल बिहारी वाजपेयी की उदार छवि का असर है?
अटल बिहारी वाजपेयी संघ को पंथनिरपेक्ष बनाने की कोशिश नहीं कर रहे। दरअसल संघ वाजपेयी को इतनी छूट दे रहा है कि वो अपना जनाधार बढ़ाएँ क्योंकि जिस हिंदू जनाधार को लेकर भारतीय जनता पार्टी चल रही है, उसके बूते अकेले सरकार बनाना संभव नहीं है...

पत्रकार प्रभाष जोशी को वाजपेयी की उदार छवि पर कोई यक़ीन नहीं है. भारत में प्रेम शंकर झा जैसे कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और स्तंभकारों का मानना है कि दरअसर अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी को आरएसएस की कथित संकुचित हिंदूवादी विचारधारा से दूर ले जा रहे हैं.
लेकिन पत्रकार प्रभाष जोशी इस स्थापना से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा, ''अटल बिहारी वाजपेयी संघ को पंथनिरपेक्ष बनाने की कोशिश नहीं कर रहे. दरअसल संघ वाजपेयी को इतनी छूट दे रहा है कि वो अपना जनाधार बढ़ाएँ क्योंकि जिस हिंदू जनाधार को लेकर भारतीय जनता पार्टी चल रही है, उसके बूते अकेले सरकार बनाना संभव नहीं है.''
लचीलापन
दरअसर संघ के नेताओं को मित्र सरकार न होने के नुक़सान का एहसास 1975 में लगी इमरजंसी के दौरान हुआ जब इंदिरा गाँधी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था.

मुसलमानों को लेकर भी संघ का रवैया बदलता दिख रहा है
सरसंघचालक बाला साहेब देवरस के भाई भाऊराव देवरस ने तब राजनीति में संघ की और अधिक पैठ की रणनीति तैयार की.
उसके बाद ही भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया. एक पूरी की पूरी पार्टी को दूसरी विचारधारा वाली पार्टियों में विलय करने को लचीलापन नहीं तो और क्या कहा जाएगा?
संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने मुसलमानों को परकीय या बाहरी घोषिक किया था. दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने मुसलमानों, ईसाईयों और कम्युनिस्टों को भारत का आंतरिक दुश्मन घोषित किया था.
लेकिन अब संघ मुसलमानों को अपने साथ आने का आमंत्रण दे रहा है.
विश्व हिंदू परिषद के आचार्य गिरिराज मानते हैं कि किसी भी संगठन को अपना आधार बढ़ाने के लिए शुरुआत में कट्टरपन इस्तेमाल करना ज़रूरी होता है.
प्रभाष जोशी मानते हैं कि संघ तो 1948 से अब तक सरकार से मित्रता बढ़ाने के लिए हर समझौता करता आया है.

टिप्पणियाँ

cmpershad ने कहा…
हज़ारों मंदिरों को ढहाया गया तो किसी ने आह तक नहीं की और एक मस्जिद के [जहां नमाज़ भी अता नहीं की जाती थी] ढहने पर इतनी चर्चा! प्रभास जोशी जी की अपनी लीनिग्स है जिसका सभी को पता है। राजनीति में तो हर एक की अपनी सोच होती ही है।

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