हो न गर ईमान, फिर मज़हब से है क्या फ़ायदा, दिल में रखकर मैल, क्या समझे कोई अच्छा है कौन ? ग़म बढ़ा, बढ़ता गया, बेइन्तिहां होता गया फ़ासिला सा जब हमारे दर्मियां होता गया किस से मांगें हम दुआ, किस से करें फ़रियाद हम जब ज़माने सा ही दुश्मन आसमां होता गया......

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