बंदर आपका चश्मा ले जायेगा


हाल ही में बहुत दिनो के बाद व्रंदावन जाना हुआ. पिछले कुछ सालों में काफी कुछ बदला है, अब शनिवार और रविवार को काफी भीड रहती है...दिल्ली से जाने वालो की तादाद बढी है...लोग भगवान की शरण में ज्यादा जाने लगे है या घार्मिक टूरिज्म का ये रूप है...पडों और गोसाईयो की मौज है...दिल्ली नंबर की गाडी देखकर ये लोग जिस तरह दौडते है, वो काबिलेगौर है...और जब आप ये बताते है कि आप यंही के रहने वाले है, तो मुंह पर जो भावभंगिमाये बदलती है, वो भी गौर करने लायक है...लेकिन जो बात इस बार देखने को मिली वो था बदरो का आंतक..जगह जगह लिखा है, कि आप अपना चश्मा, पर्स और मोबाइल बंदरो से संभाल के रखे...लेकिन मुझे लाइव प्रसारण देखने को मिला...मै अपनी गाडी को पार्क करके बांके बिहारी मंदिर की तरफ जाने लगा तभी हंगामा हुआ, एक बुर्जुग का चश्मा छीन कर बंदर ऊपर चढ गया...लोग चिल्लाने लगे कि केला खिलाओ...बेचारा बुर्जुग हताश निराश लग रहा था, मै भी मदद वश केले लेने पंहुचा..तो केले वाला पहले से तैयार था, बोला दर्जन भर केले से कम में बंदर नही मानेगा,...मैं हैरान था कि इसको कैसे पता कि बंदर इतने केले लेगा...मैने 6 केले लेकर भागा, और बंदर की तरफ फेकें(मुझे कुछ आईडिया बचपन का था कि बंदरो से कैसे सामान छुडवाया जाता था) लेकिन तब वो खाना लेकर या कपडे लेकर भागते थे, और एक दो बासी रोटी से मान जाते थे, लेकिन ये बंदर एंडवांस थे, इनको पता था कि क्या चींज़ महत्वपूर्ण है. लिहाजा चश्मा या मोबाइल को छीनते थे...इस प्रकरण में दुखद ये रहा कि जब तक बंदर से चश्मा छुडवाया गया, वो टूट चुका था, और वो बुर्जुग निराश थे, मैने उस बंदर की तस्वीर खीची है जो बहुत साफ नही है लेकिन गौर से देखने पर आपको हाथ में चश्मा दिखेगा..लिहाजा साथियो से अपील कि जब जाये तो घ्यान रखियेगा...

टिप्पणियाँ

अशोक बजाज ने कहा…
बहुत अच्छा लगा
Udan Tashtari ने कहा…
बड़े बदमाश और आधुनिक बंदर है ...
बेनामी ने कहा…
Really... Gazabe hai...
बेनामी ने कहा…
बंदरों का ब्रज भूमी के साथ बहुत पूराना सम्बन्ध रहा है. एक समय था जब ब्रज के हर घर में से बंदरों को भोजन दिया जाता था, लेकिन आज यहाँ के बन्दर अपना पेट तक नहीं भर पाते और मज्बुरिवास ऐसे हरकते करते हैं. अनुराग भैया जब हमारा यह सारा ब्रज हे बदल गया है तो एन बंदरों का क्या कसूर, यह तो फिर भी जानवर हैं लेकिन उन पंडो और गोस्वमिओं से लाख गुना अछे हैं जो अपने आप को बांके बिहारी का भक्त बता कर टूरिस्टों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं और लजा रहे हमारी इस ब्रज माटी को भी.

चंचल सारस्वत
दिल्ली दूरदर्शन
Dil Se ने कहा…
बंदरों का ब्रज भूमी के साथ बहुत पूराना सम्बन्ध रहा है. एक समय था जब ब्रज के हर घर में से बंदरों को भोजन दिया जाता था, लेकिन आज यहाँ के बन्दर अपना पेट तक नहीं भर पाते और मज्बुरिवास ऐसे हरकते करते हैं. अनुराग भैया जब हमारा यह सारा ब्रज हे बदल गया है तो एन बंदरों का क्या कसूर, यह तो फिर भी जानवर हैं लेकिन उन पंडो और गोस्वमिओं से लाख गुना अछे हैं जो अपने आप को बांके बिहारी का भक्त बता कर टूरिस्टों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं और लजा रहे हमारी इस ब्रज माटी को भी.

चंचल सारस्वत
दिल्ली दूरदर्शन
Dil Se ने कहा…
बंदरों का ब्रज भूमी के साथ बहुत पूराना सम्बन्ध रहा है. एक समय था जब ब्रज के हर घर में से बंदरों को भोजन दिया जाता था, लेकिन आज यहाँ के बन्दर अपना पेट तक नहीं भर पाते और मज्बुरिवास ऐसे हरकते करते हैं. अनुराग भैया जब हमारा यह सारा ब्रज हे बदल गया है तो एन बंदरों का क्या कसूर, यह तो फिर भी जानवर हैं लेकिन उन पंडो और गोस्वमिओं से लाख गुना अछे हैं जो अपने आप को बांके बिहारी का भक्त बता कर टूरिस्टों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं और लजा रहे हमारी इस ब्रज माटी को भी.

चंचल सारस्वत
दिल्ली दूरदर्शन
बेनामी ने कहा…
very intrested,

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