टूट गई सिंगुर की आख़िरी आस

टाटा मोटर्स की लखटकिया कार नैनो लंबे इंतज़ार और विवाद के बाद सोमवार को आधिकारिक तौर पर बाज़ार में उतर रही है.
टाटा मोटर्स के इस फैसले ने भले आम लोगों और कार डीलरों में उत्साह की नई लहर पैदा कर दी हो, इससे पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में स्थित सिंगुर की अंतिम आस भी टूट गई है.
यह संयोग ही है कि जिस संयंत्र में बनी नैनो बाज़ार में आनी थी, उसे उखाड़ने का काम भी सोमवार से ही शुर हुआ.
टाटा मोटर्स ने पिछले साल दो अक्तूबर को नैनो परियोजना समेटने का एलान किया था. लेकिन विगत लगभग साढ़े पांच महीनों के दौरान सिंगुर के लोगों के मन में उम्मीद की एक हल्की सी लौ जगमगा रही थी कि शायद बाद में कंपनी यहाँ से भी नैनो का उत्पादन शुरू कर दे.
लेकिन अब नैनो की लॉंचिंग और संयंत्र को उखाड़ने का काम शुरू होने के बाद सिंगुर में गहरी निराशा फैल गई है.
बीते साल अगस्त-सितंबर तक उत्साह से जगमगाती सिंगुर की गलियाँ अब वीरान हो चुकी हैं. संयंत्र के आसपास के इलाके में भी सन्नाटा फैला हुआ है.
बेरोज़गार नौजवान
कभी इस संयंत्र में काम कर रोजी-रोटी जुटाने वाले युवक अब सूनी नज़रों से अपने भविष्य के सपनों को समाधि लेते देख रहे हैं.
इलाक़े के सुजन चटर्जी कहते हैं ‘यह सिंगुर के लिए सबसे उदास दिन है. अब तक थोड़ी-बहुत उम्मीद बची थी. लेकिन अब वह भी ख़त्म हो गई. नैनो के साथ ही सिंगुर की युवा पीढ़ी की भविष्य भी अंधेरे में खो गया है.’
आधे-अधूरे मकान, टूटी सड़कें और प्लास्टिक में लिपटी मशीनें और नैनो संयंत्र के पास फैली उदासी अपनी कहानी ख़ुद बयान करती है.
मशीनें तो यहाँ से चली जाएंगी. लेकिन आधे-अधूरे मकान शायद एक टूटे सपने के गवाह के तौर पर लंबे अरसे तक सिंगुर के ज़ख़्म हरे करते रहेंगे.
परियोजना स्थल अब बाजमेलिया और गोपालनगर गांव के पशुओं का चारागाह बन गया है. इलाक़े में ज़मीन की आसमान छूती क़ीमतें एक बार फिर यथार्थ की धरती पर आ गई हैं.
नैनो परियोजना शुरू होते ही इलाक़े में धड़ल्ले से खुलने वाली बैंकों की शाखाओं को अब ग्राहकों का इंतज़ार है. यही वजह है कि रिज़र्व बैंक ने अब यहाँ नई शाखा खोलने का लाइसेंस देना बंद कर दिया है.
इलाहाबाद बैंक की गोपालनगर शाखा के मैनेजर विश्वजीत भट्टाचार्य कहते हैं ‘नैनो परियोजना के दौरान रोज़ाना कई व्यापारी लॉकर मांगने आते थे. लेकिन लॉकर ख़ाली नहीं होने की वजह से ज़्यादातर लोगों को निराश होकर लौटना पड़ता था. अब कोई भूले-भटके भी नहीं आता.’
ख़ाली दुकानें
सिंगुर बाज़ार में ज़्यादातर दुकानों पर छह महीने पहले तक जहाँ ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी, वहीं अब लोग ही नज़र नहीं आते.
बंद हो चुकी अस्थायी दुकानें, सूनसान एटीएम काउंटर और चेहरों पर फैली उदासी ही अब सिंगुर की नियति बन गई है. इलाक़े के विद्युत सांतरा कहते हैं ‘परियोजना में काम करने के दौरान मैंने बैंक में खाता खोला था. लेकिन अब खाते में पैसा ही नहीं बचा है. एटीएम कार्ड भी काम नहीं करता.’
विद्युत ने परियोजना के लिए अपनी ज़मीन दी थी. उसे परियोजना में काम भी मिला था.
सिंगुर रेलवे स्टेशन से नैनो संयंत्र तक जाने वाली जो सड़क कभी मोटरसाइकिलों और दूसरे वाहनों के शोर से गूंजती रहती थी, वहां अब सन्नाटा है.
इलाक़े के कई युवकों ने बैंक से क़र्ज़ लेकर मोटरसाइकिल वैन ख़रीदी थी. लेकिन अब कोई यात्री ही नहीं है. बैंक का क़र्ज़ बढ़ता ही जा रहा है.
ऐसे ही एक युवक संदीप डे कहते हैं दो साल पहले परियोजना के शुरू होने पर लगभग सौ युवकों ने ऐसी वैनें ख़रीदीं थीं. तब यहाँ यात्रियों की भरमार थी. लेकिन सितंबर में संयंत्र का काम ठप होने के बाद यात्री घटने लगे और अब तो कोई यहाँ आता ही नहीं.’
परियोजना स्थल पर खाने-पीने की वस्तुओं की दुकान चलाने वाले रमेन पाखिरा कहते हैं ‘इस परियोजना ने हमारा जीवन बदल दिया था. लेकिन अब नैनो का निर्माण कहीं और होने के कारण हमारे सपने हमेशा के लिए टूट गए हैं.’
कभी रोजाना पांच-सात सौ रुपए का सामान बेचने वाले पाखिरा अब रोज़ाना सौ रुपए की बिक्री के लिए भी तरस गए हैं.
परियोजना के लिए ज़मीन देने वाले लगभग तीन सौ लोगों ने ज़मीन के एवज़ मिली रक़म को जमा कर परियोजना के लिए कच्चे माल की आपूर्ति का काम शुरू किया था.
लेकिन सितंबर में काम ठप्प होने के बाद उनको अब तक अपनी बक़ाया रकम नहीं मिल सकी है.
इनमें से एक गोपाल दास कहते हैं कि ‘हमारे लिए नैनो एक सपना था, जो अब पूरी तरह बिखर चुका है. वे कहते हैं कि अगर वह कार इस संयंत्र के निकली होती तो इलाके की तस्वीर ही बदल गई होती.’
तस्वीर तो बदल ही गई है, लेकिन इसमें ग़म और उदासी के रंग ही भरे हैं। नैनो की टीस सिंगुर को लंबे समय तक सालती रहेगी.

पीएम तिवारी बीबीसी हिंदी से जुडे हैं

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Hi, it is nice to go through ur blog...well written..by the way which typing tool are you suing for typing in Hindi..?

i understand that, now a days typing in an Indian language is not a big task... recently, i was searching for the user friendly Indian language typing tool and found.. " quillpad". do u use the same..?

Heard that it is much more superior than the Google's indic transliteration...!?

expressing our views in our own mother tongue is a great feeling...and it is our duty too...so, save,protect,popularize and communicate in our own mother tongue...

try this, www.quillpad.in
Jai..Ho...

लोकप्रिय पोस्ट