चांद पर जीवन की संभावनाए

राजीव अस्थाना
देखो वो चांद छुपके करता है क्या इशारे...चांद सिर्फ इशारे ही नहीं करता बल्कि इंसान के हर कदम में हर शुभ काम में और उसकी जन्मकुंडली का नियंत्रक भी है वैदिक और ज्योतिष के जानकार मानते हैं कि चंद्रयान प्रथम की खोज से ज्योतिष विज्ञान पर कोई असर नहीं पड़ने वाला और न ही धार्मिक मान्यता में कोई बदलाव आने वाला है

चांद पर जीवन की संभावनाओं का पता लगाने के लिये चंद्रयान प्रथम तो रवाना हो गया लेकिन चूंकि इंसान के जन्म के साथ ही उसके काल चक्र की गणना भी चांद के आधार पर होती है और बच्चे भी सबसे पहले चंदा मामा का ही नाम लेते हैं लिहाजा मिशन चंद्रमा की चर्चा ज्योतिषियों के बीच भी होना तय माना जा रहा था और ऐसा हुआ भी भारतीय ज्योतिषियों में चंद्रयान को लेकर उत्सुकता तो है पर वो मानते हैं कि इस अभियान से चांद से जुड़ी मान्यताओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारतीय धर्म चंद्रमा को पूजता है बल्कि मुस्लिम समाज के पर्व और त्योहार की भी गणना चांद पर ही आधारित है चाहे वो ईद हो या शबे बारात हां ईसाइ धर्म चंद्रमा को महत्व नहीं देता लेकिन भारतीय धर्म में तो हर शुभ काम में चांद की अहमियत है और सुहागिनों के लिये तो चंद्रमा का बड़ा महत्व है अखिर वही तो है करवा चौथ का स्वामी ...ज्योतिष के जानकार कहते हैं कि विज्ञान के नजरिये से वैदिक ज्ञान को नहीं परखा जा सकता
बेशक चंद्रमा में सूर्य जितनी रोशनी नहीं है लेकिन शरद पूर्णिमा के दिन चांद की रोशनी का बड़ा महत्व है क्योंकि इसमें रखा खाना तमाम बीमारियों को दूर करता है चंद्रमा जन्म का साथी तो है ही परंपराओं और ज्योतिष में भी चंद्रमा को वाहन मन कला संन्यास और यहां तक कि विज्ञान का भी स्वामी बताया गया है ऐसे में चंद्रमा को लेकर वैदिक विज्ञान और मान्यताओं का साईंस से कोई टकराव है ही नहीं

बच्चों के चंदा मामा और वैज्ञानिकों का मिशन मून एक ही है... फर्क सिर्फ इतना है कि बच्चे जिस शैडो और धब्बे को सूत कात रही बुढ़िया समझते हैं...भारतीय वैज्ञानिक उसी बुढ़िया में रहस्य तलाश रहे हैं... इसके लिये इसरो ने मिशन मून के तहत श्रीहरिकोटा से सुबह 6.22 मिनट पर पीएसएलवी सी 11 से मानव रहित चंद्रयान एक को रवाना किया ...

भारतीय वैज्ञानिकों की मेहनत फिर रंग लाई और चांद को छूने की ख्वाहिश अब पूरी होने जा रही है... 49 घंटे की उल्टी गिनती के बाद बुधवार को 6 बजकर 22 मिनट पर जब पीएसएलवी सी 11 , चंद्रयान 1 को लेकर उड़ा तो श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में सबके चेहरे खिल उठे... इसरो के मुखिया ने अपनी टीम और देशवासियों को मिशन मून के लिये बधाई दी...
चंद्रयान एक के मिशन का एलान 2004 में ही कर दिया गया... तब से वैज्ञानिक चांद के राज को खंगालने में लग गये... इसके लिये 1380 किलो के पीएसएलवी स्पेस क्राफ्ट के जरिये 45 मीटर लंबे और 316 किलो वजन वाले चंद्रयान 1 रॉकेट को चंद्रमा के रहस्यों को तलाशने के लिये रवाना कर दिया गया... अगर सब कुछ सही रहा तो 8 नवंबर तक ये स्पेस क्राफ्ट चांद पर अपना काम करना शुरु कर देगा... वैज्ञानिकों ने इस कामयाबी पर एक दूसरे की पीठ थपथपायी...
पूरे चांद की स्कैनिंग के लिये इस चंद्रयान में 11 पेलोड उपकरण लगाये गये हैं जिसमें 6 पेलोड विदेश से मंगाये गये हैं... चंद्रमा की कक्षा में 100 किमी की उंचाई पर स्थित होकर ये यान दो साल तक काम करेगा...
तमाम उम्मीदों और कल्पनाओं को हकीकत में बदलने के लिये चंद्रयान 1 आज सुबह चांद की ओर उड़ चला... अपने दो साल के मिशन पर निकले चंद्रयान-1 को चांद के कई जटिल रहस्यों को सुलझाना होगा... इनमें यहां जीवन और दूसरी संभावनाओं की तलाश मुख्य है...

धरती का प्यारा उपग्रह चंद्रमा अपने अंदर तमाम रहस्यों को समेटे हुये है ...जमीन से देखने पर लगता है कि चांद पर न जाने कितने धब्बे हैं ...पर पता ये लगाना है कि वहां जीवन की कितनी संभावनायें हैं और लगता है कि चंदा मामा दूर के ...अब पास आ जायेंगें ... तभी पता चलेगा कि अपने इस रिश्तेदार के घर जाना कितना आसान होगा ...वैज्ञानिक मानते हैं कि चांद पर धूमकेतु टकराते रहते हैं जिससे वहां काफी बर्फ जमा है
चंद्रमा की कक्षा में दो साल के लिये भेजे गये चंद्रयान वन के जरिये तीन खास रहस्यों का पता लगाना है जिसमें पहला चंद्ममा की सतह पर बर्फ की खोज ...,दूसरा टोपोग्राफी का अध्ययन और तीसरा चंद्रमा पर लोहे के फ्रैक्शन की जांच करना
भारत का ये चंद्रयान चार चरणों में चांद तक की दूरी तय करेगा... ये दूरी तीन लाख 84 हज़ार किलोमीटर की है... इस दौरान तरंगों के ज़रिए जमीन से दो एंटिना उसका पीछा करते रहेंगे... और उसकी पूरी पोजीशन की जानकारी... इसरो के वैज्ञानिकों को मिलती रहेगी
चांद पर जाने का सफर तो 1961 में रूस ने शुरु किया था... और 1969 में एक अमेरिकी ने वहां की धरती पर कदम भी रखा...लेकिन चंद्रमा पर मानव रहित यान भेजकर भारत भी दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिन्होनें अंतरिक्ष मिशन में कामयाबी पायी है और इस लिस्ट में भारत का स्थान छठवां है हालांकि चंद्रयान प्रथम के मिशन में दुनिया भर के 500 स्पेस साइंटिस्ट्स औऱ तकरीबन 1000 तकनीशियन श्रीहरिकोटा में मौजूद रहे
22 अक्टूबर का दिन न केवल इसरो के लिये बल्कि हर भारतीय के लिये फख्र का है चंद्रमा के रहस्यों का पता लगाने के लिये मानव रहित चंद्रयान प्रथम को भेजकर भारतीय वैज्ञनिकों ने अपनी काबिलियत का तो सबूत दिया ही है साथ ही तकनीकी रूप से ज्यादा काबिल बनने वाले देशों के मुकाबले सबसे कम लागत पर भेजकर उनकी आंखे चुधिंया दी ....
जापान की मुहिम पर नजर डालें तो उसने 486 मिलियन डॉलर खर्च किया जबकि चीन के मिशन पर खर्च आया 187 मिलियन डॉलर ...1966 में नासा के भेजे गये अपोलो मिशन पर करीब आज के हिसाब से 135 बिलियन डॉलर खर्च हुआ जबकि शनि ग्रह के बारे में जानकारी जुटाने के लिये भेजे गये सैटर्न पर भी 46 बिलियन की रकम खर्च की हई लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने खर्च किया सिर्फ 86 मिलियन डॉलर यानी 386 करोड़ रूपये
भारत से पहले जिन पांच देशों ने अतंरिक्ष में अपने मिशन भेजे हैं उसमें अमेरिका,रूस,चीन,जापान और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी शामिल है लेकिन ये देश काफी पहले से अंतरिक्ष को खंगालने में जुट गये थे ...रूस ने सबसे पहले 1961 में अपना यान सोयूज टी 11 भेजा लेकिन यूरी गगारिन चक्कर लगाकर वापस लौट आये और फिर 1969 में अमेरिका ने पहली बार चंद्रमा को छूआ जब नील आर्मस्ट्रांग ने वहां कदम ऱखा
जबकि भारतीय सफर 1993 से शुरू हुआ है और इसरो का ये 14वां प्रक्षेपण है और अपने इस कामयाब सफर में इसरो ने 29 सेटेलाइट भी लांच किये हैं इस समय 16 भारतीय उपग्रह धरती का चक्कर लगा रहे हैं जिससे दूरसंचार मौसम टेलीविजन और दूरस्थ स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को सुविधायें मुहैया करायी जा रही है ...सबसे बड़ी बात ये कि इसरो की अगली मुहिम 2010 में शुरू होगी जब चंद्रयान 2 को रोबो के साथ उतारा जायेगा और 2015 में चंद्रयान 3 को भेजा जायेगा जिसमें यान वैज्ञानिकों को भी लेकर जायेगा ...

बहरहाल चंद्रयान-1 के सफल प्रक्षेपण के साथ दुनिया भर के देश भारत को बधाई दे रहे हैं आखिर अब तिरंगा भी तो चांद पर फहरेगा

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