फर्ज जो निभा ना सका

कितने फख्र से कह रहे हैं आप सब... मेरा नाम ले लेकर... फर्ज पर मर मिटने के जज्बे की बात कर कर हैं... फर्ज! यही तो है वो लफ्ज, जिसे सुनकर परिवार की तरफ देख रहा हूं और आत्मा रोने लगती है... वर्दी के फर्ज की धुन दो दशक तक इस कदर रही कि आज जब सबसे बहुत दूर हो गया हूं, तो उस फर्ज की याद आई है जो निभा नहीं सका... कभी मौका मिला, तो कुछ कर दिया... बाकि सब होता चला गया...
कल ही की तो बात है, अस्पताल में बेटे को देखने नहीं जा सका... आज अपने ही शरीर के पास उसे रोते देखकर आत्मा सिहर उठी... इसके लिए भी तो कुछ फर्ज था...
वर्दी पर फख्र, और वर्दी के फर्ज का ऐसा नसा छाया रहा, कि मेरे चले जाने के गम में सुबक रही बीटिया दिव्यांसा कब इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला...
घर और बच्चे तो मां माया की जिम्मेदारी थे ना... और उन्होंने भी तो कभी शिकायत नहीं की... मेरे जिस काम पर आप नाज कर रहे हैं, उसकी एक ताकत ये बच्चे, ये परिवार भी तो थे...
ये परिवार ही तो था जिसने कभी एहसास ही नहीं होने दिया, कि मैं न जाने कितनी बार उन्हें उनका हक देने से चूक गया... और ये इस परिवार का बलिदान ही तो था, जिसने मुझे आपका, पूरे देश का बना दिया... जिसकी बदौलत पूरा देश, हर भारतीय मुझे अपने परिवार का हिस्सा लगने लगा... बड़ा खुश होता रहा अपनी इस सोच पर...
लेकिन आज जब इतना दूर निकल गया हूं, कि इनकी दुनिया में भी नहीं लौट सकता... तो सोचने लगा हूं... कि क्या कसूर था उस डेंगू से जूझते उस बेटे का जिसे खून की एक बोतल चाहिए थी...
अस्पताल से निकलते ही उसे स्कूल में इम्तिहान देने हैं... मैंने तो इन नन्हीं सी जान के लिए जिंदगी को ही एक इम्तिहान बना दिया... आज सोचता हूं बेटे तुझे हिसाब के पर्चे की तैयारी कौन करवाएगा? यही तो था, जो मैं तुम्हारे लिए किसी भी दूसरे से कहीं बेहतर करता था...
आज लगता है कहीं पत्नी माया का गुनाहगार बन गया... जिंदगी के चुनौती भरे सफर में उसे छोड़कर बहुत दूर निकल गया...
बेटी देवयांसा, तुम्हारा भी गुनाहगार हूं... क्या क्या सपने संजोए थे... तुम्हें बड़ा बनते, तुम्हारी डोली सजते में दूर, कहीं बहुत दूर से देखूंगा...
बेटे, जल्दी ठीक होकर घर लौटना... मां और बहन का ध्यान रखना... तुम्हारी जिम्मेदारी और बड़ी है... तुम्हें ही तो बनना है मेरी नई पहचान... क्योंकि, जो भी देखेगा तुझको, तुझे मेरा लाल कहेगा।
मां-बाबूजी... तुम्हारी भा गुनाहगार हूं... आपके लिए लाठी बनने का वक्त तो अभी आया था... और मैं कमजोर कंधों पर बोझ बनकर चला गया... दूर कहीं बहूत दूर... जहां से आपका दर्द देखूंगा, तो खुद को गुनाहगार कहने से ज्यादा कुछ भी न कर पाउंगा.

टिप्पणियाँ

Udan Tashtari ने कहा…
आंखे नम हो गई पढ़ते पढ़ते..
फ़िरदौस ख़ान ने कहा…
बेहतरीन तहरीर...
Aadarsh Rathore ने कहा…
बेहतरीन। निस्संदेह उत्कृष्ठ
rajeshwari ने कहा…
Very correctly said

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