तिब्बत की त्रासदी

हाल ही के दिनो में तिब्बत पर चीनी दमन से दुनिया की आंखे एक बार फिर खुली। ओलंपिक टार्च का भी विरोध हो रहा है,भारत सरकार चीन की शाबाशी लेने मे कोई कसर नही छोड रही, हम दशको से हमारे देश में रह रहे तिब्बतियो के दर्द को भूल चुके है। और उस सभ्यता के नष्ट होने के गवाह है , जिसकी जडे हमारे देश से निकली थी, ये लेख आर्थर बोनर का है, जिसे उन्होने ९ सितंबर १९६१ को लिखा था, जो ' द सटरडे ईवनिंग पोस्ट ' में छपा था। आज ये लेख प्रासंगिक है, उसका तर्जुमा दोस्तो के लिये पेश है।

आर्थर बोनर



दार्जलिंग- हम तिब्बत के बारे में ये जानते हुये बडे हुये थे कि इसका नाम संगरीला है-जंहा दलाई लामा एक जीते जागते भगवान है और इस धरती पर मॉंक अनंत की रहस्यो के बारे मे ध्यान करते है। तिब्बत उत्तर में हिमालय की गगनचुंबी हिम पर्वत श्रंखलाओ से और दक्षिण में विशाल ताकलीमाकन रेगिस्तान से धिरा है। तिब्बत एक जीता जागता संग्राहलय है- जो Anthropologist और Adventurer के लिये रोचक है लेकिन ये उन ग्रहणियो के लिये नही है, जो खरीददारी मे व्यस्त रहती है या फिर उन नौजवानो के लिये जो डलास में सोडा फाउंटेन के पास धूमते है।
लेकिन तिब्बत हमको परेशान भी करता है। ये वो स्थानो में से है , जंहा एक रिपोर्टर लाल चीन के बांस की चारदीवारी को पार कर सकता है. और ये काम वो उन 60 हजार शरणार्थियो को इंटरव्यू करके कर सकता है , जो पिछले ढाई साल में तिब्बत से भाग आये थे। ये एक दुखदायी अनुभव था। बडे लोग उन बातो को याद करके रोने लगे। औरते अपने आंसूओ को अपने पल्लूओ से छुपाने की कोशिश करती। आप को उनसे ये वादा करना पडता है कि कुछ भी हो जाये आप उन की पहचान को गुप्त रखेगे। क्योकि उनको ये डर रहता है कि यदि उनकी पहचान बता दी गयी तो तिब्बत में रह गये उनके रिश्तेदारो के साथ बुरा सलूक किया जायेगा,।
चीन के सैनिक मई 1951 मे सबसे पहले ल्हासा में दाखिल हुये थे। उनके हाथ में माओत्से तुंग के बडे बडे पोस्टर थे। सैनिको ने बंकर , हवाई पट्टी, बनाये। उन्होने वादा किया कि वो तिब्बत की स्वायत्ता को बरकरार रखेगे।और सामाजिक तानेबाने को नही छेडेंगे। लेकिन 1958 तक आते आते हालात बिगडने लगे, पूर्वी तिब्बत में खंपा योद्धाओ ने बगावत का बिगुल बजा दिया था, और ये आंदोलन पश्चिमी तिब्बत तक पहुचने लगा था। चीनियो से टकराव बडने लगा था, 1958 मे हालात देखते हुये दलाई लामा ने भारत का रूख किया, और उनके जाते ही चीनियो ने अपनी ताकत के बूते तिब्बत के बडे शहरो पर कब्जा कर लिया। पहले उन्होने बगावत को कुचला, फिर तिब्बत की संस्क्रति को निशाना बनाया। हजारो की तादाद में बौद्ध भिक्षुओ को यातना शिवरो में डाल दिया गया। जो लोग भागने में कामयाब हुये वो बताते है कि किस तरह बेहद सम्मानित लामाओ को जन अदालतो मे लाया जाता और फिर वहा जनता में वो कम्यूनिस्ट एंजेट मौजूद रहते थे, जो आम तौर पर तिब्बती अपराधी होते थे, और जिनको इस शर्त पर लाया जाता था कि यदि वो लामाओ के खिलाफ गवाही देंगे तो उनको छोड दिया जायेगा। ये एजेंट उन लामाओ पर चीख चीख कर आरोप लगाते कि तुमने मेरे पिता का खून किया है या फिर मेरी बहन के साथ बलात्कार किया है। और फिर ये आरोप लगाने वाले लामाओ को भरी अदालत में पीटते और उन पर थूकते थे।
कुछ लोगो ने मुझे बताया कि किस तरह कम्यूनिस्ट लामाओ को लंबे गढ्ढो में लिटाते फिर उन पर खडे होकर पेशाब करते थे। ओर कहते कि वो अपने खाने के बारे में प्रार्थना करें। और जब ये लामा भूख से बेहाल हो जाते और कमजोर पड जाते तो उनको शहर में घुमाया जाता था कि देखो कोई भगवान नही है। इसके अलावा बौद्ध विहारो में चीनी सैनिक अपने जूतो के साथ जाते और पवित्र तस्वीरो पर जूते रखकर खडे होते, पांडुलिपियो को फाडते और कहते कि यदि कोई ईश्वर है तो हमको नष्ट क्यो नही करता।
चीनियो के तिब्बत मे आने से पहले ल्हासा के नजदीक तीन प्रसिद्ध मठ थे- द्रेपुंग, सेरा, और गांदेन। इन मठो में करीब 20 हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे। लेकिन चीनियो के आने के बाद इन मठो में प्रार्थना बंद करा दी गयी और इनको म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया। साथ ही तिब्बतियो के कुलीन वर्ग को खास कर निशाना बनाया गया। उनको जेलो मे डाल कर हाड फोडने वाला काम कराया जाता। और कहा जाता कि उनकी इस दशा के लिये दलाई लामा दोषी है।
ल्हासा को चार भागो मे बांट दिया गया और उन भागो को कई और भागो में –हर वार्ड में 10- 10 लोग होते थे जो हर धर पर नजर रखते कि किस धर मे कितना सामान है. हर व्यक्ति को कम से कम सामान रखने की चेतावनी दे दी गयी। प्रति व्यक्ति दो कपडे –एक गर्मी के लिये –दूसरा जाडो के लिये। हर व्यक्ति को 30 पौड खाना हर महीने दीया जाता था, जो किसी भी लिहाज से बेहद कम था।चीनियो की नजर में उच्च कुलीन तिब्बती ज्यादा बडे अपराधी थे। उन्होने उनकी जायदाद और जमीन छीन ली और उनको सबसे खतरनाक तारिंग हाउस मे रख दिया गया। ज्यादातर को 20 साल की सजा दे दी गयी, जेल में उनसे बेहद कठिन काम कराया जाता। जैसे पत्थर तोडना। रोड बनाने के लिये ले जाया जाता। और रोड बनाते वक्त इन लोगो को अक्सर बिना बताये डायनामाइट विस्फोट कर दिया जाता। यदि बच गया तो देखा जाता था कि वो फिर भी काम कर सकता है कि नही , यदि हां तो फिर काम पर लगा दिया जाता-नही तो ज्यादा धायल लोगो को पहाडी से नीचे फैंक दिया जाता है।
तिब्बत पर कब्जा करने और दलाई लामा के ल्हासा से पलायन के 2 वर्षो के भीतर चीन ने तिब्बत मे बडे पैमाने पर काम किया तिब्बत को चीन से तीन मुख्य रास्तो से जोड दिया।ये राज्य है सिंकियांग, शांधाई और कान्सू। जब ये दास्ता मैने एक भारतीय अधिकारी को सुनायी, जो चीन पर नजर रखने के काम मे लगे थे, और उनसे पूछा कि चीनी ये सब आजादी के नाम पर करते है। क्या भारत पर हमला तो नही करेंगे तो उन्होने हंसते हुये कहा कि नही चीनी इतने मूर्ख नही है। वो जानते है कि भारत पर हमला कितना खतरनाक होगा।

टिप्पणियाँ

जानकारी बढ़ी। आभार ...
Fenridal ने कहा…
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