तेरा क्या होगा कालिया (एंकर्स)

टीवी की टीआरपी किधर ले जायेगी , समझ नही आता ,ये टाइटल इसलिये दिया क्योकि फिल्म शोले का ये डायलाग एक टीवी प्रोग्राम देखकर बरबस याद आ गया... संजय तिवारी मित्र है, उम्होने कुछ दिन पहले एक लेख लिखा था कि यदि आज एस पी ज़िंदा होते तो आजतक देखकर मर जाते...काफी चर्चा हुयी उस लेख की...बजट वाले दिन आफिस जाने से पहले आदतन जब टीवी खोला कि देखलेते है कि देश दुनिया में क्या चल रहा है.... मैं भी उसी प्रोफेशन में हूं...चैनल्स सर्फ कर रहा था तो आजतक देखकर माथा ठनक गया...देखा कि दो एंकर (सीनियर) गजब कर रहे है...दीपक चौरसिया और अजय़ सिंह ने मैदान संभाला हुआ था कि गावो देहातो का क्या हाल है और शहर की क्या स्थित है...इस पर दोनो एंक्टिंग कर रहे थे...दीपक गंवई अंदाज में बोल रहे थे, और अजय शहरी थे...गजब जब हुआ कि जब धोती कुर्ता में दीपक चौरसिया अपनी चारपाई से उठे तो कार्डलैस लैपैल सरक गयी उसे संभालते हुये अजय की तरफ बढे तो वो मशीन धडाम से जा गिरी...संभालते हुये बोले कि अजय भैय्या मशीनवा तो गिर गया....फिर दोनो ने तुरंत प्रोग्राम खत्म कर दिया....देख कर अजीब लगा कि क्या हो रहा है...और आने वाला वक्त किस तरफ ले जा रहा है। सनसनी और क्राइम रिपोर्टर का एकर जिस अंदाज में बाते करते है वो संकेत देता है कि किस तरह मारामारी मची हुयी है। क्या लोगो का ध्यान खीचने के लिये एंकर वो सब करेगा जो कहानी कहती है। एक्टिंग करना बुरी बात नही है। लेकिन एंकरिंग , एक्टिंग और भांडगिरी में फर्क होता है। मै इन्ही की बिरादरी का हूं,...थोडा बहुत झेल चुका हू...अपने बॉस से कई दफा बहस हो चुकी है। लेकिन ज़ॉब की अपनी मजबूरी है। मैं भविष्य को लेकर चिंतित हू...जब ये काम शुरू किया था तो लोग इज्जत की नजर से देखा करते थे...मेरे माता पिता मेरी शादी के लिये लडकी वालो को बडे ही गर्व से बताया करते थे कि लडके को टीवी पर देख लो ....लेकिन पिछले 2-3 सालो मे जिस तरह कुकुरमुत्तो की तरह चैनल खुले है...वो मारे डाल रहे है। क्या टीआरपी की दौड में एकर से कुछ भी कराया जायेगा...कल्पना कीजिये कि कुछ सालो के बाद टीवी पर यदि कत्ल की कोई धटना बतायी जा रही है...तो एंकर खंजर लेकर खडा होगा...और बार बार कैसे हुआ कत्ल चीखचीख कर बतायेगा। या फिर बलात्कार पर कैसे बतायेगा...ये स्थित रोगंटे खडे कर देती है।।।मन करता है कि दूसरा ढिकाना तलाशना शुरू कर देना चाहिये।

टिप्पणियाँ

ALOK PURANIK ने कहा…
होना यह है कि
अनुराग पुनैठा कापालिक, तांत्रिक की ड्रेस में
स्क्रीन पर है् और कह रहे हैं ऊं फट फट फट हट चट करट करचततकारतच तर
चुड़ैल बाहर आ।
पीछे से प्रोड्यूर डांट रहा है, अबे अमेकिन चुडैल निकालियो कंपटीटर चैनल गोरी चुड़ैल चला रहा है। देसी चु़डैल में पिट जायेंगे।
एक कोर्स करा रहा हूं आजकल पत्रकारिता का है , पर नाम है
भूत मैनेजमेंट नाग अरेंजमेंट।
नौकरी बचानी है, संपर्क करें।
Rajesh Roshan ने कहा…
अच्छा हुआ की एस पी पहले मर गए. वैसे भी रोज के विशेष में जरुर मरते होंगे. रही बात दीपक और अजय की तो भैया चैनल मालिक का है ये लोग मुलाजिम है जो मालिक कहेगा वही करेंगे
mamta ने कहा…
यही कहा जा सकता है की टी.आर.पी.जो ना कराये सो थोड़ा।
mamta ने कहा…
यही कहा जा सकता है की टी.आर.पी.जो ना कराये सो थोड़ा।
Shiv Kumar Mishra ने कहा…
हाँ साहब. मैंने भी देखा. ख़ुद को भारत का 'लैरी किंग' समझने वालों का हाल देखा. कल सुबह भी और रात को.......

सत्य कभी-कभी कल्पना से ज्यादा विस्मय कर देने वाला होता है.
visfot ने कहा…
हर विधा का एक ढंग होता है और उसकी एक सीमारेखा भी. टीवी में न अभी ढंग तय है न सीमारेखा. इसलिए अति उत्साह में ऐसे कर्तब दिखाए जाते हैं. यह मूर्खता है और कुछ नहीं.
जूली झा ने कहा…
इन चैनल को देखते हुए मैं तो उस दिन का इन्तजार कर रही हूं जब प्रोग्राम के नाम के साथ "एक्शन,रोमांस और कमेडी से भरपूर"औपचारिक रुप से जुड़ जायेगा।
ठीक ही तो है एक्टर कम एंकर
जूली झा ने कहा…
इन चैनल को देखकर मैं तो उस घड़ी का इन्तजार कर रही हूँ जब प्रोग्राम के नाम के साथ "रहस्य, रोमांच और एक्शन" से भरपूर शब्द औपचारिक रूप से जुड़ जायेगा।
ठीक ही तो है एक्टर कम एन्कर
जूली झा ने कहा…
इन चैनल को देखकर मैं तो उस घड़ी का इन्तजार कर रही हूँ जब प्रोग्राम के नाम के साथ "रहस्य, रोमांच और एक्शन" से भरपूर शब्द औपचारिक रूप से जुड़ जायेगा।
ठीक ही तो है एक्टर कम एन्कर

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