6 दिसंबर-काल या द्रोहकाल




इतिहास के बहुत से भ्रमो मे से
एक यह भी है
कि महमूद गजनवी लौट गया था
लौटा नही था वह यहीं था
सैकडो बरस बाद अचानक
वह प्रकट हुआ अयोध्या में
सोमनाथ में किया था उसने
अल्लाह का काम तमाम
इस बार उसका नाम था जयश्रीराम

जी हां महमूद गजनवी आया था, मैने भी देखा था...उसे...उम्र कम थी, लेकिन सूरत और सीरत की पहचान हो गयी थी...
इस बार भी 6 दिसंबर आया और चला गया,कुछ रस्म अदायगी हुयी, बस...लेकिन किसी ने कोई सबक नही लिया...सबक गलतियो से सीखने का...क्योकि गलती तो हुयी थी... मीडिया मे थोडी हलचल दिखायी दी,सरकार की तरफ से सांप्रदायिक लिहाज से संवेदनशील इलाको मे पुलिस का बंदोबस्त किया गया...इस्लामी आतंकवाद की बाते की गयी... दिल्ली पुलिस की तरफ से एक स्टोरी आयी कि हुजी के 6 आतंकवादी दिल्ली में धुस आये है...कार का नंबर बता दिया गया और उनकी शक्ल और उनकी नागरिकता भी बता दी गयी...सवाल ये है कि जब इतना पुख्ता जानकारी थी तो कार्यवाही की बजाये...मीडीया से क्यो बात की गयी... उधर गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने फिर वही किया जिसमें वो मास्टर माने जाते है...6 दिसंबर 1992 वो दिन है , जिसे एक आम हिंदुस्तानी तंज, और डर से याद रखता है...उस धटना को लोग अपनी तरह से याद रखते है...15 साल पहले उस दिन मैं भी सफर पर था, मेरे पिता मुरादाबाद मे तैनात थे,वो पुलिस महकमें में थे...माहौल में तनाव चल रहा था, जयश्रीराम के नारे रोज़ सुनायी पड रहे थे...आडवानी रथ लेकर धूम रहे थे...मै मथुरा से मुरादाबाद के रस्ते पर था ,यूपी की रोडवेज की बस से... शाम के 6 बजे का वक्त रहा होगा , दिसंबर में 6 बजे तक अंधेरा हो जाता है...गाडी अलीगण से नकली ही थी,और नरौरा के आसपास थी, कि अचानक गाडी में मौजूद एक व्यक्ति ने रेडियो लगा दिया, समाचार आ रहे थे, कि बाबरी मस्जिद पर वीएचएस और बजरंग दल के कार्यकताओं ने हमला कर दिया है...ये खबर एक धमाके की तरह थी...पूरी बस में सन्नाटा छा गया, सभी के लिये अप्रतियाशित था... लोगो को लगा कि ये क्या कर दिया...एक डर तुरंत धर कर गया और वो था हिंदू-मुस्लिम दंगो का...सभी को अपनी सुरक्षा का डर सताने लगा...वैसे भी अलीगण,बंदायू, मुरादाबाद मुस्लिम बहुल इलाके है...सभी ने अपने शीशे और टाइट कर दिये...बस एक सुनसान सडक पर चली जा रही थी...जब रात को तकरीबन 9 बजे गाडी मुरादाबाद पंहुची तो शहर में सन्नाटा छाया हुआ था....ये आने वाले तूफान से पहले की शांति थी....मैं लकी था कि मेरे पिता पुलिस में थे, लिहाज़ा मेरे लिये गाडी भिजवा दी गयी थी...मै तो चला गया,लेकिन ये चिंता लगी रही कि उन लोगो का क्या होगा जो मेरे साथ बस में थे, कुछ महिलाये थी...खैर रात निकल गयी, लेकिन आने वाले दिन कर्फ्यू, गिरफ्तारिया, और राजनैतिक उथल पुथल के रहे...दंगे कही भी हो, उसकी आग दूर तक जाती है, किसी का रिश्तेदार किसी ना किसी शहर मे जरूर मिल जायेगा...मेरे दोस्त भी कुछ मुसलमां थे, पापा को उर्दू से खासा लगाव रहा है...वो किसी भी मुस्लिम से चाहे वो मुलज़िम ही क्यो ना हो, उसका इश्ने-शरीफ जरूर पूछा करते थे...ना बताने पर डांट लगाया करते थे... खैर ये दिन भी बीत गये....लेकिन जो बदलाव 6 दिसंबर ने मेरे जीवन में किया वो ये था कि उस तारीख के बाद मैं और मेरे पिता मिलने आने वाले या फिर मेरे मुस्लिम दोस्तो के प्रति ज्यादा नरम हो गये थे, इस्लाम की तारीफ, उनकी कल्चर, तहजीब का बखान हम ज्यादा करने लगे थे...ये शायद बताने का प्रयास था कि ये मुल्क उन्ही का है....और जो दर्द उनको 6 दिसंबर ने दिया है...उसे शायद वो भूल जाये...ये मेरे लडकपन के दिनो की एक कोशिश हुआ करती थी कि कुछ गलत हमसे हो गया है...शायद माफी मांगता एक हिंदुस्तानी दूसरे हिंदुस्तानी से...और जब कई सालो के बाद कैफी साहब की नज़्म- राम का दूसरा बनवास सुनी , तो लगा कि मैं अकेला नही था अपनी कोशिश में...

राम बनवास से लौट के जब धर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्स-ऐ-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
6 दिसंबर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कंहा से मेरे धर में आये
जगमगाते थे जंहा राम के कदमो के निंशा
प्यार की कहकंशा लेती थी अंगडाइयां जंहा
मोड उसी नफरत के उसी रहगुजर में आयी

धर्म क्या उनका है,क्या जात है ये जानता कौन
धर ना जलता तो रात में उन्है पहचानता कौन
धर जलाने को मेरा लोग जो मेरे धर में आये
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारे खंजर
तुमने बाबर की तरफ फैंके थे सारे पत्थर
हैं मेरे सर के खजार ज़ख्म जो सर में आये
पांव सरजू में अभी राम ने धोये भी ना थे
कि नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुये अपने द्वारे से उठे
राज़धानी की खिंजा आयी नही रास मुझे
6 दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे
.ये तारीख मेरी कोशिश है मेरे हर उस दोस्त से माफी मांगने की जिसे मुसलमान कहा जाता है....

टिप्पणियाँ

दिल की आवाज़ तो यही कहती है जो अपने तजुर्बे में आपने बताया है. मुझे लगता है कि आज पत्रकारिता में करीब 8 से दस साल का वक्त गुज़ार देने के बाद भी एक इंटर्न को एक झटके में अपने से ऊपर बैठा देना पीड़ा देता है.सुना करते थे कि दुनियां चढ़ते सूरज को सलाम करती है. लेकिन महसूस हुआ कि ये दुनियां अगर कुछ देती है तो सिर्फ बुराई देती है.अफसोस है कि टीआरपी के चलते बंदर भैंस बगुला बत्तख सब कुछ दिखाया जा रहा है. अगर चैनल "हनुमान के आंसू" दिखा कर भी टीआरपी बटौर सकते है तो यंहा दोस्त कुछ भी हो सकता है. अपने आप को पत्रकार कहने वाले 93 फीसदी लोग हताश होंगे जो इतने लंबे अनुभव के बाद भी वो मुकाम हासिल नही कर पाए जिसके वो हकदार थे. इसके लिए चाहे अफसर ज़िम्मेदार हो या लिंग. लेकिन आजकल बॉसेज़ के बारे में यह भी कहा जा सकता है ये ग़मज़दा है लाए कंहा से खुशी के गीत वंही देगें जो पाएंगे अपने अनुभव से ये........आपको आपके ब्लाक और साईट की बधाई लगातार ऐसे कटाक्ष लेखों की उम्मीद में भूपेश

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